चतरा, झारखंड
एक वक्त था जब सूबे के नक्सल प्रभावित चतरा जिले की फिजाओं में अफीम की गंध फैली हुई थी। नक्सलियों के डर से गांव के लोग अफीम की खेती में उनका भरपूर साथ देते थे। लेकिन आज समय बदला है, खौफ कम हुआ है और लोग नक्सलियों के सामने सिर उठा रहे हैं।दरअसल चतरा जिले के सिमरिया अनुमंडल स्थित नक्सल प्रभावित शीला गांव भी उनमें से एक है, जहां की महिलाओं ने अफीम की गंध खत्म कर यहां की फिजाओं में गेंदा फूल की महक ला दी है और आज गेंदा फूल की खेती से महिलाओं की जिंदगी महकने लगी है।
कभी अफीम की खेती में लगी महिलाओं को आज गेंदा फूल के बलबूते इनकी आमदनी तो हो ही रही है और अब उनकी "आत्मनिर्भरता" गांव की दूसरी महिलाओं के लिए एक प्रेरणा बनकर सामने आ रही है। राष्ट्रीय आजीविका मिशन के तहत सखी मंडल की महिलाएं गेंदा फूल की खेती में किस्मत आजमा रही है। चुनावी सभा हो या कोई मांगलिक समारोह, फूल-माला सब की पहली जरूरत होती है। इस जरूरत को गांव की महिलाओं ने बखूबी भुनाया और इनकी मेहनत का ही नतीजा है कि आज शीला गांव गेंदा फूल का उत्पादक होने के साथ-साथ निर्यातक भी बन चुका है।
वैकल्पिक आजीविका के रूप में सखी मंडल की 50 से अधिक महिलाएं खेती कर रही हैं। गेंदा फूल की खेती सिमरिया, प्रतापपुर, कुंदा समेत अन्य प्रखंडों में की जा रही है। सिर्फ सिमरिया प्रखंड में के बनासाड़ी, शीला, चौपे और टूटीलावा गांव में 15 महिला किसानों ने मिलकर तकरीबन 30 हजार गेंदा फूल के पौधे लगाए हैं। खास बात यह है कि उनके लिए बाजार Jharkhand State Livelihood Promotion Society उपलब्ध करा रहा है।
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